in , ,

लोकतंत्र के सहयात्री गांधी

लोकतंत्र के भविष्य की चर्चा चलती है तो आम तौर पर हमारे सामने नई तकनीक, चुनाव सुधार या संस्थाओं के नए ढाँचे आते हैं। ऐसे में यह सवाल अटपटा लग सकता है कि क्या गांधी आज भी इस बहस में कोई जगह रखते हैं। गांधी को हम अक्सर इतिहास की किताबों, जयंती के आयोजनों और सत्य-अहिंसा के उपदेशों में बंद कर देते हैं। पर भारतीय लोकतंत्र जिन उलझनों से गुज़र रहा है, उन्हें देखें तो लगता है कि गांधी के लेखन में उनके उत्तर का सिरा मिलता है।

एक विचार यह भी है कि आधुनिक भारत के चिंतकों और कर्मशील लोगों को हमें ‘संसाधन’ की तरह बरतना चाहिए, ताकि एक अधिक समतामूलक और भविष्य की ओर देखने वाली संस्थागत रचना की कल्पना की जा सके। इस निमंत्रण को स्वीकार करें तो सबसे पहले एक विरोधाभास से टकराना पड़ता है।

गांधी का विरोधाभास

आंदोलन के प्रतीक

गांधी को सामान्यतः विरोध की राजनीति का प्रतीक माना जाता है। जनता के आंदोलन, नागरिक स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले संगठन और तरह-तरह के जन-प्रदर्शन आज भी अहिंसक सत्याग्रह की शैली से प्रेरणा लेते हैं, यह बात सब मानते हैं। उनकी सफल आंदोलनकारी की छवि उनके जाने के आठ दशक बाद भी बनी हुई है।

संस्था-निर्माण पर चुप्पी

पर इसी छवि की एक कीमत भी है। गांधी को आंदोलनकारी के रूप में इतना देखा गया कि संस्था-निर्माण जैसे गंभीर विषयों पर उन्हें प्रासंगिक नहीं माना गया। उनके प्रशंसक भी इस प्रश्न पर चुप रह जाना ही ठीक समझते हैं।

राज्य के आलोचक, अराजकतावादी स्वभाव

इसकी एक वजह खुद गांधी हैं। वे आधुनिक राज्य की अवधारणा के कठोर आलोचक थे। उन्होंने अपने को ‘दार्शनिक अराजकतावादी’ कहना पसंद किया। अपनी असंगतियों को वे छिपाते नहीं थे, बल्कि उनका उत्सव मनाते थे, और उभरते सवालों के उत्तर एक सूत्र-वाक्य से नहीं, हर संदर्भ को देखकर देते थे।

‘हिंद स्वराज’ (1909) इस स्वभाव का सबसे अच्छा प्रमाण है। वह उनकी एकमात्र पुस्तक है जिसमें उन्होंने कुछ भी बदलने, जोड़ने या अद्यतन करने से इनकार कर दिया। जिस व्यक्ति ने अपनी बात पर इतनी दृढ़ता रखी हो, उससे संस्थाओं के प्रति परंपरागत ढंग की निष्ठा की उम्मीद करना भी ठीक नहीं।

रचनात्मक आवेग: विरोध के पीछे निर्माण

फिर भी, राज्य की अवधारणा से असहमति के बावजूद गांधी के लेखन और राजनीति में एक रचनात्मक आवेग है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। उनका संदेश यह था:

हर तरह के अन्याय का विरोध करो, पर सत्य और अहिंसा के मूल्यों पर टिके रहकर।

साथ ही ऐसी वैकल्पिक संस्थाओं की रचना में रुचि लो जो मानवीय हों, विकेंद्रित हों, समावेशी हों और सबसे बढ़कर सचमुच लोकतांत्रिक हों।

संस्था साधन है, साध्य नहीं

1925 में ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने एक बहुत सीधा सूत्र दिया। जब तक कोई संस्था मेरी और राष्ट्र की प्रगति में सहायक है, मैं उसके प्रति निष्ठावान हूँ। पर जिस क्षण मुझे लगे कि वह प्रगति में सहायक होने के बजाय बाधा बन गई है, उसके प्रति अनिष्ठा रखना मेरा कर्तव्य हो जाता है।

इसका अर्थ यह है कि संस्था अपने आप में पूज्य नहीं है। उसकी परीक्षा इसी कसौटी पर होगी कि वह मनुष्य और समाज के विकास में कितनी मदद करती है। यह दृष्टि हमें लोकतांत्रिक संस्थाओं को आँख मूँदकर मानने और उनसे पूरी तरह निराश हो जाने, दोनों से बचाती है।

लोकतंत्र के सामने तीन बुनियादी प्रश्न

गांधी के इस रचनात्मक दृष्टिकोण से देखें तो भारतीय लोकतंत्र की तीन मूल समस्याएँ सामने आती हैं।

  1. सामाजिक ऊँच-नीच और आर्थिक विषमता, जो ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ को बेअसर कर देती है।
  2. राजनीतिक रूप से नियंत्रित जनसंचार, जो एक प्रभावी जनमत बनने ही नहीं देता।
  3. राजनीतिक सत्ता का केंद्रीकरण, जो व्यक्ति-केंद्रित निरंकुशता की ओर ले जाता है।

अब इन तीनों को गांधी की नज़र से एक-एक करके देखते हैं।

पहला प्रश्न: सामाजिक पदानुक्रम और आर्थिक विषमता

वोट की बराबरी, हैसियत की गैर-बराबरी

मताधिकार हमें कागज़ पर बराबरी देता है। संविधान का अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है और अनुच्छेद 15 तथा 17 क्रमशः भेदभाव और अस्पृश्यता को रोकते हैं। पर जब समाज में जाति के पूर्वाग्रह, सांप्रदायिक रूढ़ियाँ और धनी तथा ताकतवर लोगों का वर्चस्व गहराई तक जमा हो, तो बराबर का वोट बराबर की आवाज़ नहीं बन पाता।

बीते तीन दशकों की तस्वीर

इन्हीं प्रवृत्तियों ने पिछले तीन दशकों में हमारे सार्वजनिक जीवन का रूप बदला है:

दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है।

अधिकांश भारतीयों की गरीबी और आर्थिक असहायता अब तक सच्चे अर्थ में चुनावी मुद्दा नहीं बन सकी है।

दलितों और अल्पसंख्यकों के हाशियाकरण की बात ऐसे की जाती है जैसे वह किसी समूह-विशेष की समस्या हो।

‘राष्ट्रीय’ और ‘समूह-विशेष’ का छल

यही तीसरी बात सबसे गहरी चोट करती है। जब किसी वंचित वर्ग की तकलीफ को ‘उसकी अपनी’ समस्या कहकर अलग कर दिया जाता है, तो यह धारणा बनती है कि उनकी चिंताएँ राष्ट्र की चिंताएँ नहीं हैं। राष्ट्रीय हित और वंचितों के हाशियाकरण के बीच एक अनकही दीवार खड़ी हो जाती है, जो आगे चलकर नीति-निर्माण का अलिखित नियम बन जाती है।

समाधान की दिशा

इसके उत्तर में एक मज़बूत सांस्कृतिक नीति-ढाँचे की ज़रूरत है। उसका काम केवल संस्थाओं की कार्य-संस्कृति को लोकतांत्रिक बनाना नहीं है, बल्कि ऐसा वातावरण रचना भी है जिसमें मुसलमान, दलित और महिलाएँ खुद को सुरक्षित महसूस करें, और जिसमें उनके सरोकार ‘राष्ट्रीय मुद्दे’ की तरह सुने और सुलझाए जाएँ। गांधी के शब्दों में, लोकतंत्र की कसौटी यही है कि पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक उसका लाभ और उसकी गरिमा पहुँचे।

दूसरा प्रश्न: जनमत और मीडिया

जनमत सत्याग्रही का हथियार

गांधी जनमत की ताकत को बहुत अच्छी तरह पहचानते थे। उनके लिए सत्याग्रही का काम केवल अपनी बात कहकर बैठ जाना नहीं था। उसे उस बुराई के विरुद्ध जनमत जगाना भी था जिसे वह मिटाना चाहता था।

28 अगस्त 1929 को ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा कि जब किसी सामाजिक कुरीति के विरुद्ध लोकमत इतना जाग जाए कि कोई भी, चाहे वह कितना ही ऊँचा क्यों न हो, खुलेआम उसका समर्थन करने का साहस न कर सके, तब वह कुरीति टिक नहीं सकती। एक जागा हुआ और समझदार जनमत सत्याग्रही का सबसे असरदार हथियार है।

आज की चुनौती

यह बात आज इसलिए और ज़रूरी हो गई है कि:

  • समाचार और प्रचार के बीच की रेखा लगातार धुँधली होती जा रही है।
  • मीडिया की अर्थव्यवस्था और राजनीतिक सत्ता के बीच का रिश्ता अब साफ दिखता है।
  • जब जनसंचार पर राजनीतिक नियंत्रण का साया हो, तो समझदार जनमत बनाने की ज़मीन ही कमज़ोर हो जाती है।

संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, पर सवाल यह है कि क्या वह स्वतंत्रता सूचना की सच्चाई और विविधता में भी बदल पा रही है। बिना सही सूचना के जनमत केवल भीड़ की राय बन जाता है।

तीसरा प्रश्न: राजनीतिक केंद्रीकरण

एक अलग कोण

तीसरी चुनौती राजनीतिक दलों में और शासन में सत्ता के केंद्रीकरण की है। गांधी इस सवाल को बिलकुल अलग कोण से देखते हैं। उनके अनुसार केंद्रीकरण अचानक या अकेले नहीं आता। वह एक व्यवस्थागत प्रक्रिया का नतीजा है, जिसे पेशेवर राजनेता भी गढ़ते हैं और मतदाता भी सींचते हैं। यानी दोष केवल ऊपर बैठे लोगों का नहीं, नीचे खड़े लोगों का भी है।

जागरूक और नैतिक मतदाता

लोकतंत्र में मतदाताओं की संख्या का बल गांधी जी जानते थे। इसी कारण वे एक सुशिक्षित और नैतिक रूप से सचेत मतदाता की कल्पना करते हैं। 9 जून 1920 को ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा कि हमें एक ऐसा निर्वाचक वर्ग चाहिए जो निष्पक्ष, स्वतंत्र और बुद्धिमान हो। यदि मतदाता राष्ट्रीय मामलों में रुचि नहीं लेते, और उन लोगों को चुनते हैं जिनसे उनके निजी संबंध हैं या जिनकी मदद की उन्हें अपने लिए ज़रूरत है, तो ऐसी स्थिति देश के लिए अहितकर होगी।

आज के कान को यह तर्क शायद आदर्शवादी लगे, पर कोई यह नहीं कह सकता कि लोकतंत्र को अधिक समतावादी और समावेशी बनाने के लिए ‘निर्वाचन की नैतिकता’ का महत्व नहीं है। 1985 के 52वें संविधान संशोधन के ज़रिए बने दलबदल-विरोधी कानून जैसे प्रयास यह बताते हैं कि दलों में अनुशासन और सत्ता-केंद्रीकरण की समस्या को संस्थागत स्तर पर भी पहचाना गया था। पर कानून अकेला काफी नहीं है। जब तक मतदाता का विवेक न जागे, केवल नियमों से व्यक्ति-केंद्रित राजनीति नहीं रुकती।

गांधी का त्रिस्तरीय उत्तर

इन तीनों समस्याओं के लिए गांधी की सोच से तीन स्तरों पर एक रास्ता निकलता है।

1. कर्म की शांतिपूर्ण राजनीति

इसका उदाहरण ऐसा आंदोलन हो सकता है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से समझौता किए बिना मीडिया को जवाबदेह बनाने के लिए चले। यहाँ विरोध है, पर हिंसा नहीं, और माँग है, पर दमन नहीं।

2. विमर्श की राजनीति

ऐसा विमर्श जो मानव-मुक्ति के संघर्ष को सार्वजनिक जीवन की प्रमुख कथा बना दे। यानी जो बात आज हाशिये की मानी जाती है, वह केंद्र की चर्चा बने।

3. आस्था और प्रतिबद्धता की राजनीति

गांधी के लिए जो स्वयं को सत्याग्रही कहता है, वह निकट और प्रार्थनापूर्ण आत्म-निरीक्षण करता रहता है। 28 अगस्त 1929 के ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा कि ऐसे व्यक्ति को यह परखना चाहिए कि जिन ‘बड़ी बुराइयों’ के विरुद्ध वह धर्मयुद्ध छेड़ने निकला है, कहीं वह स्वयं उनसे ग्रस्त तो नहीं है।

तीनों में यही तीसरा सबसे कठिन है, क्योंकि यह दूसरों पर उँगली उठाने से पहले अपने भीतर झाँकने की माँग करता है।

निष्कर्ष

गांधी हमारे हाथ में कोई तैयार नुस्खा नहीं देते। वे एक ऐसे सहयात्री की तरह हैं जो हर मोड़ पर सही सवाल पूछते चलते हैं: क्या यह संस्था मनुष्य के विकास में मदद कर रही है? क्या यह जनमत सच के आधार पर बना है? क्या यह सत्ता कमज़ोर के पक्ष में है या मज़बूत के?

उनके साथ चलने का निमंत्रण इसलिए एक नई संभावना खोलता है। वे हमें यह उम्मीद दे सकते हैं कि जो आज असंभव लगता है, उस पर सोचना बंद नहीं करना है। एक सजग जनमत, एक नैतिक मतदाता और आत्म-निरीक्षण करने वाला राजनीतिक कार्यकर्ता, इन तीनों के बिना लोकतंत्र समतावादी और समावेशी नहीं हो सकता। इस यात्रा में गांधी हमें आशा, आकांक्षा और बौद्धिक साझेदारी, तीनों दे सकते हैं।


Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

रणनीतिक स्थिरता बनाम शक्ति-प्रतिस्पर्धा: बदलती विश्व-व्यवस्था की नई चुनौती

अपनी ही बनावट से बँटी अदालत