सितंबर 2026 में शी जिनपिंग की अमेरिका की राजकीय यात्रा केवल एक कूटनीतिक आयोजन नहीं थी। यह उस बड़े प्रश्न का संकेत थी कि क्या विश्व व्यवस्था बहुपक्षीय ढांचों से हटकर कुछ शक्तिशाली देशों के आपसी सौदों की ओर बढ़ रही है। 23 सितंबर को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप स्वयं जॉइंट बेस एंड्रयूज़ पहुंचे और चीनी राष्ट्रपति का स्वागत किया। रेड कार्पेट बिछा, सैन्य सम्मान दिया गया और बमवर्षक विमानों ने आसमान में उड़ान भरी।
यह दृश्य पहले देखे हुए जैसा लगा। 15 अगस्त 2025 को अलास्का के एंकोरेज में ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भी ऐसा ही स्वागत किया था।
शिखर वार्ता: प्रदर्शन अधिक, परिणाम कम
वाशिंगटन की इस वार्ता में तमाशा अधिक था और ठोस उपलब्धियां सीमित रहीं। यह उसी क्रम की अगली कड़ी थी जो अक्टूबर 2025 में बुसान और मई 2026 में बीजिंग की मुलाकातों में दिखा था। हर बार ट्रंप ने इन बैठकों को ‘G2 क्षण’ के रूप में प्रस्तुत किया। अर्थात, भव्य प्रतीकात्मकता के बीच वास्तविक समझौते नपे-तुले रहे, पर संदेश स्पष्ट था कि दो महाशक्तियां एक-दूसरे को बराबरी का दर्जा दे रही हैं।
G2 की अवधारणा: उद्भव और स्वरूप
- अर्थशास्त्री सी. फ्रेड बर्गस्टन ने 2005 में अमेरिका और चीन की साझा आर्थिक अगुआई का विचार रखा था। इसे ‘चिनमेरिका’ या ‘कोंडोमिनियम’ भी कहा गया।
- उनकी कल्पना मौजूदा संस्थाओं को समाप्त करने की नहीं, बल्कि उन्हीं के भीतर साझा नेतृत्व की थी।
- चीन ने स्वयं ‘नए प्रकार के महाशक्ति संबंध’ की बात उठाई, जिसका आधार संप्रभुता और मूल हितों का परस्पर सम्मान है।
- आज के G2 का अर्थ संस्थागत सह-शासन से कम और इस स्वीकारोक्ति से अधिक है कि वाशिंगटन और बीजिंग के पास असमान रूप से अधिक भौतिक शक्ति है और उनके निर्णयों का असर द्विपक्षीय दायरे से कहीं आगे जाता है।

G3 या त्रिमूर्ति की संभावना
इसी परिदृश्य में एक दूसरा समीकरण भी मौजूद है: दो की जगह तीन ध्रुव, यानी अमेरिका, चीन और रूस। आर्थिक आकार में रूस अमेरिका और चीन दोनों से काफी पीछे है। फिर भी उसके पास कई ताकतें हैं:
- दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु शस्त्रागार
- व्यापक सैन्य पहुंच
- ऊर्जा संसाधनों का प्रभावी लाभ
- मजबूत शक्तियों के गणित को बिगाड़ने की सिद्ध क्षमता
इसलिए प्रश्न उठता है कि क्या दुनिया एक नई, अधिक सघन विश्व व्यवस्था के जन्म की पीड़ा से गुजर रही है? यह द्विध्रुवीय होगी, यानी अमेरिका और चीन की, या त्रिध्रुवीय, जिसमें एक प्रतिशोधी रूस के लिए भी जगह बनेगी?
G2 का आकर्षण और उसके जोखिम
- G2 की सबसे बड़ी खूबी उसकी सरलता है। दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, दो सबसे शक्तिशाली सेनाएं और दो सबसे प्रभावशाली तकनीकी तंत्र किसी स्थिरता-ढांचे पर सहमत हो जाएं, तो शेष विश्व को उसी के अनुसार ढलना होगा।
- वाशिंगटन के लिए: यह व्यावहारिक और लेन-देन आधारित बोझ-बंटवारा है। इससे अपनी सापेक्ष गिरावट को संभालने का रास्ता मिलता है, जैसे चीन को कुछ क्षेत्रीय वर्चस्व सौंपकर प्रमुख क्षेत्रों में स्थिरता खरीद लेना। बहुपक्षीय सहमति बनाने की उलझी प्रक्रिया से भी छुटकारा मिलता है।
- बीजिंग के लिए: यह बराबरी के प्रतिद्वंद्वी के रूप में अंतिम मान्यता है। यह चीन की सदी भर पुरानी राष्ट्रीय पुनर्जागरण की आकांक्षा पर मुहर लगाती है।
- इसका गंभीर दोष: अपने तर्क के हिसाब से G2 गहराई से अस्थिर करने वाली व्यवस्था है। यह ऐसा पदानुक्रमित नियंत्रण रचती है जिसमें यूरोप से लेकर भारत और ब्राज़ील तक बाकी सभी देशों के हित दो शक्तियों की सनक और आपसी प्रतिद्वंद्विता के नीचे दब जाते हैं।
G3 का तर्क: ‘दोहरे अवरोध का विरोधाभास’
G3 का विचार दूसरा रास्ता सुझाता है। इसमें वाशिंगटन दोनों प्रतिद्वंद्वियों को एक साथ साधता है। इसकी प्रेरणा 1970 के दशक की उस नीति से मिलती है जो हेनरी किसिंजर ने गढ़ी थी, जब चीन के साथ खुलापन मास्को को अलग-थलग करने के लिए रचा गया था।

इसका केंद्रीय तर्क ‘दोहरे अवरोध का विरोधाभास’ है। यदि अमेरिका चीन और रूस दोनों का एक साथ सामना करने की कोशिश करे, तो:
- चीन और रूस का आपसी सहयोग और गहरा हो सकता है।
- अमेरिका पर रणनीतिक अति-विस्तार का बोझ बढ़ेगा।
- सहयोगी देशों में थकान पैदा होगी।
इसमें रूस जरूरी नहीं कि अमेरिका या चीन का बराबरी का प्रतिद्वंद्वी हो, पर वह तीसरा विघटनकारी कोण है जिसकी हरकतें दोनों के आकलन बदल देती हैं।
संभावित G3 उत्तर-पूर्व एशिया की तीन उप-व्यवस्थाओं के ऊपर एक दबाव-नियामक परत का काम भी कर सकता है:
- अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया का प्रतिरोध ढांचा
- चीन, जापान और दक्षिण कोरिया का सहयोग ढांचा
- चीन, रूस और उत्तर कोरिया की धुरी
रूस का दृष्टिकोण
- मास्को के लिए G3 शीर्ष श्रेणी में पहुंचने का निर्णायक मार्ग है। इससे वह अलग-थलग देश की छवि से बाहर निकल सकता है और महाशक्ति का विशेषाधिकार दोबारा पा सकता है।
- चीन के साथ उसकी ‘असीमित’ साझेदारी इस संरचना की बुनियादी धुरी प्रदान करती है। इसके पीछे पश्चिमी वर्चस्व का मुकाबला करने और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नए सिरे से गढ़ने की साझा इच्छा है।
- क्रेमलिन नवंबर 2026 में शेनझेन में होने वाले एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) शिखर सम्मेलन के दौरान त्रिपक्षीय बैठक पर विचार करने को तैयार दिखता है। उधर ट्रंप भी मास्को और बीजिंग से व्यक्तिगत स्तर पर सीधे सौदे करने में रुचि रखते हैं।
- इससे यह शंका जोर पकड़ती है कि क्या गुटों की पुरानी वास्तुकला की जगह महाशक्तियों की मोलभाव वाली छोटी ज्यामिति ले रही है।
समर्थकों का तर्क: उन्नीसवीं सदी का ‘कॉन्सर्ट ऑफ यूरोप’
इन विचारों के पैरोकार मानते हैं कि बिखरती दुनिया को संभालने का यही एकमात्र यथार्थवादी मार्ग है। वे इसे 19वीं सदी के ‘कॉन्सर्ट ऑफ यूरोप’ की वापसी के रूप में देखते हैं, जिसमें महाशक्तियों ने आपसी प्रतिस्पर्धा और प्रभाव-क्षेत्रों का प्रबंधन करके व्यापक टकराव को रोका था। 1815 की वियना कांग्रेस के बाद विकसित इस व्यवस्था ने कुछ दशकों तक यूरोप में बड़े युद्ध टाले, पर वह छोटे और मध्यम देशों की इच्छाओं की कीमत पर चली थी। आलोचक इसी बिंदु पर आज के संदर्भ में चेताते हैं।
बहुपक्षीय मंचों पर छाया
G2 या G3 की छाया वैश्विक बहुपक्षीय समूहों पर गहरी पड़ती है। इनमें BRICS, G20, शंघाई सहयोग संगठन (SCO), G7, यूरोपीय संघ और अफ्रीकी संघ शामिल हैं। ये सभी इस आधार पर खड़े हैं कि भारत, जापान, ब्राज़ील, फ्रांस और मिस्र जैसी मध्यम शक्तियां बहुध्रुवीय विश्व रच सकें।
एजेंडा तय करने की शक्ति दो या तीन हाथों में सिमटने के परिणाम:
- G20: वैश्विक आर्थिक शासन के प्रमुख मंच से घटकर पहले से तय हुए महाशक्ति-सौदों पर मुहर लगाने वाला सदन बन सकता है।
- G7: पहले से मौजूद पश्चिमी गुट बचे-खुचे समूह में बदल सकता है, यानी चिंतित सहयोगियों का जमावड़ा, या बाहर छूटे देशों पर दबाव बनाने का मंच।
- BRICS और SCO: विपरीत दिशाओं में खिंचेंगे। एक ओर ये वैकल्पिक बहुपक्षवाद के वाहक हैं, दूसरी ओर ऐसे अखाड़े भी जहां चीन और रूस ग्लोबल साउथ को अनुशासित करने या अपने पक्ष में करने की कोशिश करते हैं।
भारत की असहज स्थिति
भारत की स्थिति सबसे अधिक असुविधाजनक है, क्योंकि वह किसी भी मॉडल में सहज नहीं बैठता।
G2 की स्थिति में: भारत के रणनीतिक रूप से हाशिये पर चले जाने की आशंका बढ़ती है।
G3 की स्थिति में: यह भय और तीखा हो जाता है। भारत तीन दबावों के बीच फंसा दिखता है:
- ऐसा लेन-देन आधारित वाशिंगटन जो भारत की प्राथमिकता घटा सकता है।
- ऐसा चीन जिसके साथ संबंध अनसुलझे सीमा विवाद और विशाल व्यापार घाटे के बोझ से दबे हैं।
- ऐसा रूस जो बीजिंग पर बढ़ती निर्भरता के कारण एशिया में चीन की शक्ति को भारत के पक्ष में संतुलित करने में शायद अब सक्षम न रहे।

भारत के लिए आगे का मार्ग:
- आर्थिक और सैन्य सामर्थ्य को सुदृढ़ करना
- रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना
- साझेदारियों में विविधता रखना
- बहुपक्षीय समूहों को ठोस गुटों की बजाय व्यावहारिक मंचों के रूप में बरतना
अतिरिक्त आयाम:
1. ऐतिहासिक सादृश्य: 1972 में निक्सन की चीन यात्रा त्रिकोणीय कूटनीति का आरंभ थी। तब अमेरिका ने चीन को साधकर सोवियत संघ पर दबाव बनाया। आज समीकरण उलट चुका है और चीन-रूस निकटता अमेरिका के लिए चुनौती है।
2. थ्यूसिडाइडीज़ का जाल: हार्वर्ड के विद्वान ग्राहम एलीसन ने यह अवधारणा लोकप्रिय की कि उभरती और स्थापित शक्ति के टकराव से युद्ध का जोखिम बढ़ता है। G2 को इस जोखिम के प्रबंधन का एक उपाय भी माना जा सकता है।
3. भारत की बहु-संरेखण नीति: भारत क्वाड, BRICS और SCO, तीनों का सदस्य है। यही रणनीतिक स्वायत्तता की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है। भारत 2026 में BRICS की अध्यक्षता भी कर रहा है, जो मंच को अपने हित में दिशा देने का अवसर है।
4. संयुक्त राष्ट्र सुधार: शक्ति के संकेंद्रण के इस दौर में सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग और भी प्रासंगिक हो जाती है।
5. ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: भारत की ‘वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ’ की पहल मध्यम शक्तियों को एकजुट करने का साधन बन सकती है।
समालोचना
G2 और G3, दोनों व्यवस्थाओं में एक साझा खामी है: वे वैधता की बजाय शक्ति पर टिकी हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर की संप्रभु समानता का सिद्धांत ऐसे पदानुक्रम से टकराता है। साथ ही, चीन और अमेरिका के बीच प्रौद्योगिकी, व्यापार और ताइवान जैसे मुद्दों पर गहरे मतभेद हैं, जिससे दीर्घकालिक सहयोग की गुंजाइश संदिग्ध रहती है। रूस और चीन की साझेदारी भी असमान है, जिसमें मास्को कनिष्ठ भागीदार बनता जा रहा है। इसलिए तीनों की स्थायी त्रिमूर्ति टिकाऊ होगी, इसमें संदेह है।
निष्कर्ष
विश्व व्यवस्था इस समय संक्रमण में है। न पुरानी एकध्रुवीयता लौटने वाली है, न बहुध्रुवीयता का आदर्श सहजता से स्थापित हो रहा है। वाशिंगटन में हुई शी जिनपिंग की अगवानी इस अनिश्चितता का प्रतीक है, जहां प्रतीकात्मक ठाठ के पीछे नए शक्ति-समीकरणों की तलाश चल रही है।
भारत के लिए संदेश स्पष्ट है। उसे किसी भी गुट का पिछलग्गू बने बिना अपनी आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक क्षमता बढ़ानी होगी, ताकि जिस भी ज्यामिति में विश्व ढले, उसमें वह मेज पर बैठा रहे, मेन्यू का हिस्सा न बने।
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